Wednesday December 31, 1969
कैसी कैसी होली
By डॉ. भगवतीशरण मिश्र
कैसी-कैसी होरी!
Mar 10, 01:48 pm
रंगों
का त्योहार होली भारत भर में कई रूपों में इसलिए मनाया जाता है, क्योंकि
इन सभी के साथ अपने-अपने आंचलिक नाम, महत्ता और कहानियां जुड़ी हुई हैं।
कहीं होली नव वर्ष के शुभारंभ के उपलक्ष्य में मनाई जाती है, तो कहीं इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के अमर-प्रेम को याद करते हैं।
फगुआ : बिहार में होली को फगुआ या फागुन पूर्णिमा भी कहा जाता है। फगु
का अर्थ होता है लाल रंग और पूर्णिमा, यानी पूरा चांद। हिंदू कैलेंडर के
अनुसार, फाल्गुन मास के अंत और चैत्र मास की शुरुआत में होली मनाई जाती
है। दरअसल, नव वर्ष, यानी संवत्सर अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग दिन मनाई
जाती है। कुछ स्थानों पर फाल्गुन को वर्ष का अंतिम महीना और चैत्र को वर्ष
का नया महीना मानते हैं। बिहार में होलिका दहन को संवत्सर दहन भी कहा जाता
है और चैत्र की पहली तारीख को होली, यानी नए साल के रूप में मनाया जाता
है।
धुलैंडी: इस दिन हरियाणा में भाभियों की चांदी होती है। वे अपने देवर
से वर्ष भर किए गए हंसी-मजाक का बदला लेती है। वे दिन भर साड़ी से लट्ठ
तैयार कर उन्हें पीटने का उपक्रम करती रहती हैं। शाम में देवर अपनी
भाभियों को उपहार में मिठाइयां देकर खुश करने की कोशिश करते हैं। साथ ही
एक स्थान पर एकत्रित होकर युवक दही की मटकियां भी फोड़ते हैं।
रंगपंचमी और शिमगो : महाराष्ट्र के लोग होली को रंगपंचमी कहते हैं।
यहां के स्थानीय लोग, खासकर मछुआरे शिमगो मनाते हैं। इस दिन लोग खूब
नाचते, गाते और खुशियां मनाते हैं। नाच के दौरान लोग अपनी खुशियां और गम
एक-दूसरे को बताकर बांटते हैं। अपने हाथ और मुंह के सहारे एक विचित्र शैली
में आवाज निकालना इस त्योहार की सबसे बड़ी खासियत है।
दोल जात्रा : पश्चिम बंगाल में होली को दोल जात्रा भी कहा जाता है। इस
दिन राधा और कृष्ण की मूर्ति को खूब सजा कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती
है। इस दौरान, स्त्रियां भक्ति गीत गाती हैं और पुरु ष रंग और गुलाल
छिड़कते जाते हैं।
होला मोहल्ला : यह खास अंदाज वाली होली पंजाब में मनाई जाती है।
वास्तव में, यह होली के दिन से तीन दिन तक चलने वाला वार्षिक मेला होता
है, जो बहुत बड़े पैमाने पर आनंदपुर साहिब में लगाया जाता है। दरअसल, इसे
सिखों के दसवें गुरु , गुरु गोविंद सिंह ने शुरू किया था। इसका मुख्य
उद्देश्य था सिख युवकों को शारीरिक स्तर पर मजबूत करना। मेले में नवयुवक
कई तरह के साहसिक कारनामे भी दिखाते हैं। अंतिम दिन शोभा यात्रा के
साथ-साथ लंगर भी लगाए जाते हैं।
कामान पंडिगई : तमिलनाडु में कामदेव की पूजा की जाती है। प्रचलित
कथाओं के अनुसार, भगवान शंकर के कोप के कारण कामदेव जल कर भस्म हो जाते
हैं। लेकिन बाद में उनकी पत्नी रति की प्रार्थना पर उन्हें जीवित भी कर
देते हैं। तमिलनाडु में ऐसी मान्यता है कि होली के दिन ही कामदेव दोबारा
जीवित होते हैं। इसलिए यहां के लोग गीतों के माध्यम से रति की व्यथा-कथा
कहते हैं और कामदेव को जलन से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें चंदन अर्पित
करते हैं।
होलिका दहन महिलाओं के लिए वर्जित क्यों?
होलिका दहन में महिलाओं का शामिल होना वर्जित है और यह बात कम ही
लोगों को मालूम है। होलिकादहन केवल घर के पुरु षों को ही करना चाहिए,
लेकिन क्यों? बता रहे हैं ज्योतिषाचार्य डा. नंदन मिश्र राधे-राधे..
भारतीय पर्व एवं त्योहारों के साथ कई तरह की कथाएं एवं किंवदंतियां
जुड़ी हुई हैं। वास्तव में, इन सभी कथाओं के पीछे गूढ़ार्थ छिपे होते हैं।
यदि हम इन अप्रत्यक्ष संदेश को समझने की कोशिश करें और उनका पालन करें, तो
बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकाला जा सकता है।
होलिका दहन की कथा
हम सभी होली की पूर्व संध्या, यानी फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को होलिका
दहन मनाते हैं। इसके साथ एक कथा जुड़ी हुई है। कहते हैं कि वर्षो पूर्व
पृथ्वी पर एक अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यपु राज करता था। उसने अपनी प्रजा
को यह आदेश दिया कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की वंदना न करे, बल्कि उसे ही
अपना आराध्य माने। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर का परम भक्त था। उसने
अपने पिता की आज्ञा की अवहेलना कर अपनी ईश-भक्ति जारी रखी। इसलिए
हिरण्यकश्यपु ने अपने पुत्र को दंड देने की ठान ली। उसने अपनी बहन होलिका
की गोद में प्रह्लाद को बिठा दिया और उन दोनों को अग्नि के हवाले कर दिया।
दरअसल, होलिका को ईश्वर से यह वरदान मिला था कि उसे अग्नि कभी नहीं जला
पाएगी। लेकिन दुराचारी का साथ देने के कारण होलिका भस्म हो गई और सदाचारी
प्रह्लाद बच निकले। उसी समय से हम समाज की बुराइयों को जलाने के लिए
होलिका दहन मनाते आ रहे हैं।
सार्वजनिक होलिका दहन
हम लोग घर के बाहर सार्वजनिक रूप से होलिका दहन मनाते हैं। इसके पीछे
एक संदेश छिपा हुआ है। दरअसल, हम आसुरी वृत्तियों को मृत मानव [होलिका] का
रूप देकर जलाते हैं। हम सभी जानते हैं कि मृत व्यक्ति को हमेशा घर से दूर
जलाया जाता है। और इसमें कई व्यक्ति भी शामिल होते हैं। सच तो यह है कि
उत्तरप्रदेश, बिहार आदि राज्यों में होलिकादहन के बाद सूतक [किसी भी
पवित्र चीज, स्थान आदि को नहाने से पूर्व तक छूने से परहेज] मनाया जाता
है। इस दौरान पूरी रात्रि तक पवित्र कार्य शुरू करने से परहेज किया जाता
है। इसलिए होलिका दहन को कभी घर में संपन्न नहीं किया जा सकता है।
स्त्रियों का प्रवेश वर्जित
हिंदू रीति-रिवाज में घर के पुरु ष ही मृतक का दाह-संस्कार करते हैं।
वास्तव में, इस दौरान घर की स्त्रियों का सम्मिलित होना वर्जित है। ठीक
उसी प्रकार होलिका दहन में स्त्रियों का शामिल होना निषिद्ध होता है।
यदि हम होलिका दहन को अपने घर में अंजाम देते हैं, तो इसे अपशकुन माना
जाता है। इसलिए रात्रि में स्त्रियों को केवल ईश्वर का मंत्र-जाप ही करना
चाहिए।
सही विधि
सूखे घास-पत्ते, उपले, बांस की कमानियां आदि से होलिका का पुतला बनाया
जाता है। इसके चारों तरफ लकडि़यां डाली जाती हैं और एक बांस-स्तंभ भी
बनाया जाता है। ध्यान रहे कि हिंदू रीति के अनुसार, ब्राह्मण या पुरोहित
ही इसमें आग डालें। होलिका जलने के दौरान लोगों द्वारा अग्नि के चारों तरफ
परिक्रमा की जाती है।
इस दौरान हम अग्नि देवता से अपनी गलत वृत्तियों के लिए क्षमा मांगते
हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि वे हमारी सभी बुराइयों का नाश करें।
इस वर्ष रात्रि 9.09 से 12.00 बजे तक का समय होलिका दहन के लिए शुभ है।
अग्नि की पूजा
हम होलिका दहन में अग्नि की पूजा इसलिए करते हैं, क्योंकि अग्नि को
परमात्मा का स्वरूप माना जाता है। इनकी वंदना से हमें दैहिक, दैविक और
भौतिक तापों से मुक्ति मिलती है। यह सच है कि यदि हम होलिका दहन के सही
अर्थो को समझें, तो संपूर्ण विश्व में आतंकवाद जैसी समस्या ही न रहे!
क्योंकि यह समस्या मुख्य रूप से बुरी भावना, यानी दुर्भावना की ही देन है।
इसलिए आइए होलिकादहन के अवसर पर अग्निदेव से यह प्रार्थना करें कि हम सभी
बैर-भाव भूल जाएं और प्रेम पूर्वक होली खेलें।
रंगों की भाषा
क्या आपको मालूम है कि पीला रंग तनाव से मुक्ति दिलाता है और लाल रंग शक्ति का संचार करता है? होली पर जानें रंगों की भाषा।
रंग मूलत: चार प्रकार के होते हैं:- लाल, पीला, हरा, नीला। आज इन्हीं
रंगों को मिश्रित कर भिन्न-भिन्न रंग बनाए जा रहे हैं। सच तो यह है कि ये
चार प्रमुख रंग ही सात्विक एवं सदुपयोगी होते हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएं
हैं:-
लाल रंग स्फूर्ति, वेग और शक्ति प्रदान करता है, वहीं हरा रंग शांति,
संतुलन एवं आत्मीयता का द्योतक है। दूसरी ओर, नीला रंग आकर्षण,
महलवाकांक्षा एवं विकास का प्रतीक है और पीला रंग तनाव से मुक्ति देता है।
यदि हम इन प्राकृतिक रंगों से होली खेलें, तो मन स्वत: इन सारे गुणों
से भर उठेगा। हम सभी जानते हैं कि काले रंग पर कोई रंग नहीं चढ़ता है।
सूरदास कहते हैं:-
सूरदास प्रभु कारि कामरी चढ़ै न दूजो रंग।
इसलिए यदि मन को होली की समानता, बंधुत्व, अध्यात्म, मित्रता, प्रेम,
सौहार्द आदि के रंगों से रंगना है, तो पहले उसे अंदर के सभी विकारों यथा
संकीर्णता, लोभ, काम, क्रोध, असमानता आदि से रहित कर पूर्णतया शुद्ध करना
होगा। सच तो यह है कि मन की शुद्धि ही अध्यात्म का आरंभ है और जब उसे
उपर्युक्त सद्भावनाओं से रंग दिया जाए, तो व्यक्ति की आध्यात्मिकता चरम
बिंदु पर पहुंच जाती है।
टेसू के फूलों का रंग
-आज प्राकृतिक रंगों को भूल कर हम रासायनिक रंगों का प्रयोग करने लगे
हैं, जो सर्वथा हानिकारक है। वास्तव में, कृत्रिम रंगों से होली का
उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। कुछ वर्षो पूर्व तक हम लोग टेसू के फूल का
फाग [रंग] निकाल कर, उससे होली खेलते थे। इसीलिए इसका एक नाम फगुआ भी है।
फाग खेलते हुए ग्रामीण एक-दूसरे को उत्साहित करते थे:-
मत बैठो वसंत निहारो रे।
उठ होली खेलो यारों रे।।
रंगों से कुछ रोगों की चिकित्सा भी संभव है। एक अमेरिकन नवयुवती के
सिर की केश-राशि समाप्त हो गई थी। डॉक्टरों ने इनके दोबारा उगने की
संभावना नकार दी थी। डॉक्टर बिट्ट के अनुसार, उनके सिर पर कुछ दिनों तक
लगातार नीले रंग का प्रकाश डाला गया। उनकी केश-राशि न केवल दोबारा उग आई,
बल्कि पहले से भी घने हो गए। 'प्रिंसिपल ऑफ लाइट ऐंड कलर' पुस्तक के
अनुसार, नीले प्रकाश से पीलिया रोग की चिकित्सा सफलतापूर्वक संभव है।
जनकल्याण की भावना
-होली का त्योहार मात्र मनोरंजन के लिए नहीं मनाया जाता है, बल्कि
इसके पीछे जनकल्याण की मंगल भावना भी होती है। यह पर्व हमारे
ऋषि-महर्षियों के वैज्ञानिक चिंतन की देन है। रंगों का यह त्योहार समानता
का संदेश देता है। इस दिन लोग जात-पात, धनी-दरिद्र, ऊंच-नीच, शत्रु-मित्र
के भाव भूल कर एक-दूसरे को रंगों से रंगते हैं । इस दौरान लोग वैमनस्यता,
विद्वेष, ईष्र्या, घृणा की भावनाओं को विस्मृत कर एक-दूसरे के गले लगते
हैं। यह है समानता की अमूल्य भावना, जिसकी स्थापना के लिए हमारे सद्ग्रन्थ
युगों से संदेश देते आ रहे हैं। श्रीमद्भागवत गीता में कहा गया है कि मन
में सबके प्रति समानता लाना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है [भागवत-7/8]।
वहीं दूसरी ओर, महाभारत का कथन है कि जो व्यक्ति मनसा-कर्मणा-वाचा सभी
लोगों के हित की बात सोचता है, वास्तव में वही आध्यात्मिक व्यक्ति है
[जाजला प्रसंग]। गीता उद्घोषित करती है- जो सबको एकसमान नजरों से देखता
है, वही सच्चा योगी है [गीता-6/32]।
सांप्रदायिक सद्भाव
-होली के साथ सांप्रदायिक सद्भाव भी जुड़ा हुआ है। हजरत निजामुद्दीन
औलिया को कौन नहीं जानता? उनके यहां होली का प्रचलन महान शायर अमीर खुसरो
ने किया था। कहते हैं कि हजरत अपने भांजे की मौत के कारण खिन्न थे। अमीर
खुसरो ने उन्हें सरसों के पीले फूल भेंट कर कहा:-
अब यार तेरी।
वसंत मनाई।।
बादशाह बहादुर शाह जफर भी वसंतोत्सव के दीवाने थे। वह एक जगह सरसों के लहलहाते फूलों को देख कर गा पड़े:-
सकल वनफूल। बन रही सरसो।।
सूरज की किरणों में सात रंग होते हैं। प्रसिद्ध संगीतज्ञ एवं कवि 'गेटे' ने इन रंगों और संगीत के सात स्वरों में समानता ढूंढ ली।
हम होली के अवसर पर विश्व कवि रवींद्रनाथ ठाकुर की यह पंक्ति गुनगुनाएं:-
आज वसंत द्वार पहुंचा है तुम्हारे।
अपने अवगुंठित, कुंठित जीवन से ।
नहीं करो तिरस्कृत इसको।। [गीतांजलि-55] आइए, होली पर हम सभी कुंठाओं
और विभिन्न नकारात्मक विचारों को त्याग कर मन को आध्यात्मिक रंगों से रंग
दें।
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